बेनाम सा ये दर्द, ठहर क्यूं नही जाता

बेनाम सा ये दरद, ठहर क्यु नही जाता..

जो बीत गया हैं, वो गुजर क्यू नही जाता…

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सब कुछ तो हैं, क्या दुदाती हैं ये निगाहे

क्या बात हैं, में वक्त पे घर क्यु नही जाता..

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वो एक चेहरा तो नही सारे जहा में…

जो दूर हैं वो दिल से उतर क्यो नही जाता…

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देखता हू में अपनी ही उलझी हुई, राहों का तमाशा

जाते हैं सब जिधर, मैं उधर क्यो नही जाता।

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वो नाम ना कब से, ना चेहरा ना बदन हैं..

वो खवाब हैं तो बिखर क्यो नही जाता।….