बहुत सही लिखा है संजीत भाई, आम आदिवासी दो पाटन के बीच पिस रहा है, और छत्तीसगढ जो कि वन सम्पदा और खनिजों से लबालब है आज चन्द लुटेरों के कब्जे में आ गया है, राजनैतिक पार्टियों से अब कोई उम्मीद नहीं बची इसलिये जनता को ही जागना होगा, चूँकि मेरा बचपन भी छत्तीसगढ में ही बीता है इसलिये दुख और अधिक होता है…लेकिन आप जैसे लोगों के रहते कुछ उम्मीद भी जागी रहती है…
January 17, 2008 at 1:08 pm
बहुत सही लिखा है संजीत भाई, आम आदिवासी दो पाटन के बीच पिस रहा है, और छत्तीसगढ जो कि वन सम्पदा और खनिजों से लबालब है आज चन्द लुटेरों के कब्जे में आ गया है, राजनैतिक पार्टियों से अब कोई उम्मीद नहीं बची इसलिये जनता को ही जागना होगा, चूँकि मेरा बचपन भी छत्तीसगढ में ही बीता है इसलिये दुख और अधिक होता है…लेकिन आप जैसे लोगों के रहते कुछ उम्मीद भी जागी रहती है…
January 17, 2008 at 1:10 pm
आप सचमुच बेहद संजीदा लेखक हैं। यह हमारा सांझा दर्द है। आभार आवाज बुलंद करने के लिये। मैं आपके साथ हूँ।
*** राजीव रंजन प्रसाद